विलियम शेक्सपियर का टाइटस एंड्रोनिकस एक प्रारम्भिक एलिज़ाबेथीन त्रासदी है, जिसे अंग्रेज़ी में लिखा गया और सामान्यतः 1590 के दशक की शुरुआत में रचित माना जाता है; यह 1594 में क्वार्टो रूप में पहली बार मुद्रित हुआ और बाद में 1623 के पहले फोलियो में शामिल हुआ। उस समय लंदन के व्यावसायिक रंगमंच ने सनसनीखेज शैलियों को बढ़ावा दिया था, और यह नाटक रोम के इतिहास व शास्त्रीय साहित्यिक आदर्शों—विशेषकर पुनर्जागरण मानवतावादी शिक्षा के माध्यम से प्रसरित सेनेकन प्रतिशोध नाटकों—से नवीनीकृत जुड़ाव का परिणाम है। शेक्सपियर की काल्पनिक रोम, जो गणतान्त्रिक नागरिक भाषा और साम्राज्यवादी तमाशे के बीच टिकी हुई दिखती है, सार्वजनिक मंच को राजनीतिक समारोह, न्यायिक बहस और तीव्र भावनात्मक दृश्यों के लिए परखने का एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय पृष्ठभूमि देती है। नाटक प्रतिशोध के चक्रों और अनुष्ठानिक न्याय के बदले प्रतिशोधी हिंसा में बदलने के फलस्वरूप नागरिक व्यवस्था के पतन के इर्द‑गिर्द केंद्रित है; इसमें विकृति, यौन हिंसा और मानवीय मांस के रूप में प्रतिशोध जैसे भयानक कर्मों को न सिर्फ़ भयावह घटनाओं के रूप में बल्कि नाटकीय समस्याओं के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। यह दिखाते हुए कि सम्मान, भक्ति और कानून के आह्वान कितनी आसानी से क्रूरता के औज़ार बन सकते हैं, नाटक यह भी खोलकर रख देता है कि सार्वजनिक सद्गुण कैसे हथियार बनते हैं और निजी शोक कैसे राजनीतिक कार्रवाई में परिवर्तित हो जाता है। लंबे समय से इसे शेक्सपियर की सबसे क्रूर त्रासदियों में गिना गया है, पर इसका योगदान उनकी विकास यात्रा को समझने में निर्णायक रहा है: यह प्रतिशोध परंपराओं, शैलिगत अतिशयोक्ति और तमाशे व नैतिक जिज्ञासा के परस्पर संबंध का एक संकेंद्रित अध्ययन प्रस्तुत करता है, तथा बाद के त्रासदी नाटकों और आधुनिक मंचन परंपराओं पर, विशेषकर प्रतिनिधित्व की नैतिकता और हिंसा की सौन्दर्यशास्त्र पर, इसके दीर्घकालिक प्रभाव को रेखांकित करता है।