फ्रां츠 काफ्का का उपन्यास मुक़दमा 1914-1915 के बीच लिखी गई था और इसे उनके मित्र तथा साहित्यिक कार्यकारी मैक्स ब्रॉड ने 1925 में उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित किया। यह कृति ऑस्ट्रो-हंगेरियाई साम्राज्य के क्षय के वर्षों में उभरी, जब सामाजिक अशांति, नौकरशाही का विस्तार और आधुनिक शहरी जीवन में बढ़ता अलगाव व्याप्त था। प्राग के जर्मनभाषी यहूदी काफ्का नौकरशाहियत की भूलभुलैया से अपने पेशेवर जीवन के दौरान, खासकर श्रमिक दुर्घटना बीमा संस्थान में कार्य करते हुए, भलीभांति परिचित थे; इन व्यक्तिगत अनुभवों के साथ प्रथम विश्व युद्ध पूर्व यूरोप की अनिश्चितताएँ और अवैयक्तिक राज्य प्रणालियों का उदय इस उपन्यास की अधिकार और व्यक्तिगत असहायता की परेशान करने वाली खोज को आकार देने में सहायक रहे। थीमैटिक रूप से मुक़दमा को व्यापक रूप से अस्तित्वगत चिंता, न्याय की अस्पष्टता और असमझनीय प्रणालियों के दबाव पर चिंतन माना गया है। इसका प्रभाव साहित्य, रंगमंच और दर्शन में दूरगामी रहा, विशेषकर अल्बेर काम्यू और जीन-पॉल सार्त्रे जैसे अस्तित्ववादी चिंतकों पर, साथ ही उन उत्तरआधुनिक लेखकों पर जो सत्ता और अलगाव के विषयों से जूझते हैं। काफ्का की संक्षिप्त, सटीक गद्य-भाषा और स्वप्न-सदृश उलझन ने अनेक लेखकों और कलाकारों को प्रेरित किया, जिससे 'काफ्काई' शब्द प्रचलित हुआ — ऐसी स्थितियों के लिए जो अतियथार्थ दबाव और नौकरशाही की बेतुकापन से चिह्नित हों। व्यक्ति के रूप में काफ्का अपने जीवनकाल में बड़े पैमाने पर अज्ञात रहे और उन्होंने केवल थोड़ी रचनात्मक सामग्री प्रकाशित की, पर मुक़दमा आधुनिकतावाद और 20वीं सदी के विश्व साहित्य में उनकी स्थायी विरासत सुनिश्चित करने वाले केंद्रीय ग्रंथों में से एक बना हुआ है।