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विलियम शेक्सपियर का हेनरी चौथा, भाग प्रथम (संभवतः 1597–1598 के आसपास रचित) देर-एलिज़ाबेथन इतिहास-नाट्य परंपरा का एक केंद्रीय नाटक है जो सार्वजनिक मंच पर राष्ट्रीय स्मृति और राजनीतिक वैधता को पुख्ता करने का प्रयत्न करता है। शेक्सपियर, जो लॉर्ड चेम्बरलेन्स मेन्स (बाद में द किंग्स मेन्स) के मुख्य नाटककार थे, अर्ली मॉडर्न इंग्लिश में लिखते हुए खाली छंद की उच्च लय को सैनिकों और नागरिकों की तात्कालिक बोले-चाले की भाषा के साथ मिलाते हैं। नाटक वंशीय इतिहास, राजकुमार हल की पूर्ण शासक बनने की शिक्षा, और युद्ध-रोज़ के बाद विभक्त इंग्लैंड में विद्रोह तथा आज्ञाकारिता के बीच के तनाव के इर्द-गिर्द घूमता है। इसका नाटकीय भाषा-खाका भव्य औपचारिक भाषणों और फालस्टाफ व उसके साथियों की खुरदरी, त्वरित हास्यपरक चतुराई के बीच बार-बार झूलता है, जिससे एक ही कथा-फ़लक में अनेक स्वर प्रकट होते हैं। 1598 के क्वारटो में पहली बार प्रकाशित यह रचना उस मुद्रण-संस्कृति का फल है जिसने नये नाटकों के प्रसार को तेज किया और शेक्सपियर की राष्ट्रीय नाट्यकार के रूप में साख को मजबूत किया; बाद में इसे फर्स्ट फोलियो में बड़े इतिहास चक्र के हिस्से के रूप में पुन:स्थापित किया गया, जिसने सार्वजनिक समारोह और गहरे चरित्र-विश्लेषण के मिश्रण की परंपरा को पक्का किया।
प्रारम्भिक दृश्यों से ही प्रश्न उठता है कि संप्रभुता कैसे अर्जित और सिद्ध की जाती है; राजकुमार हल शरारती उमंग और सार्वजनिक दायित्व के बीच झूलता हुआ दिखाई देता है। नाट्यांश यह भी दिखाते हैं कि कैसे भव्य युद्ध-भाषण और बदतमीज़, सड़क-सम्बन्धी हास्य एक साथ वफादारी, दावे और घातक परिणामों के बाजार को संचालित करते हैं—एक ऐसी भाषा जो एक ओर धर्मयुद्ध को पावन बना सकती है और दूसरी ओर चोरी-मज़ाक को अनुमति दे सकती है। नाटक नेतृत्व का सूक्ष्म चित्रण प्रस्तुत करता है: हल को सुख और सत्ता की तृष्णा को संयमित करना सीखना होगा और व्यक्तिगत पहचान को राजसी माँगों के साथ सुलझाना होगा, जबकि फालस्टाफ कर्तव्यहीन करिश्मे का आलोचनात्मक विकल्प पेश करता है। यह भूख और दायित्व, अभिनयात्मक शाहीपना और नैतिक गंभीरता के बीच का संतुलन शेक्सपियर के इतिहास-नाटकों की विशिष्टता बन गया और बाद के राजनीतिक नाटकीय चित्रणों को प्रभावित करता रहा। नाटक की संवादात्मक बनावट—ऊँचे औपचारिक भाषण और नीचे के हास्यपूर्ण गपशप के बीच बार-बार होने वाला परिवर्तन—अंग्रेज़ी रंगमंच की उस क्षमता को भी आकार देती है जिसमें राष्ट्रीय मिथ्याख्यान को सामाजिक आलोचना के साथ जोड़ा जा सके; यही रूपरेखा बाद के इतिहासों और आधुनिक रूपांतरणों में वैधता, स्मृति और शासन के अभिनय-स्वरूप की पड़ताल में बार-बार उभरती है।