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1788 में प्रकाशित, 'व्यवहारिक तर्क की आलोचना' इमैनुएल कांट की तीन प्रमुख आलोचनाओं में दूसरी है, जो 'शुद्ध तर्क की आलोचना' (1781) के बाद और 'न्याय की आलोचना' (1790) से पहले आई। प्रबोधन काल के उत्कर्ष पर लिखी यह कृति कांट की नैतिक दर्शन को विकसित और रक्षित करती है, समकालीन विवादों के संदर्भ में उनकी नैतिक धारणाओं को परिष्कृत करते हुए। यह यूरोप में तीव्र दार्शनिक सक्रियता के दौर में उभरी, जहां नैतिकता, स्वतंत्रता और मानव ज्ञान के आधार से जुड़े प्रश्न बौद्धिक जीवन के केंद्र में थे। तब कांट कोनिग्सबर्ग में प्रोफेसर थे और अपने कठोर पद्धति एवं तर्क को नैतिक नियम से जोड़ने की महत्वाकांक्षा के लिए पहले से ही विख्यात थे; उनका लक्ष्य ऐसी नैतिकता की नींव रखना था जो अनुभवजन्य परिस्थितियों से स्वतंत्र हो। पुस्तक के केंद्रीय विषयों में इच्छाशक्ति की स्वायत्तता, नैतिक आज्ञा (categorical imperative) तथा नैतिक दायित्व और मानवीय स्वतंत्रता के बीच संबंध शामिल हैं। यह कहना आगे बढ़ाती है कि व्यावहारिक तर्क—क्रिया से संबंधित तर्क—नैतिक सिद्धांतों का अंतिम आधार है, जो सिद्धांतों को अनुभव या प्रवृत्ति की बजाय तर्कात्मक अनिवार्यता में आधार देता है। 'व्यवहारिक तर्क की आलोचना' कर्तव्यनिष्ठ नैतिकता की एक आधारशिला बन गई और फिच्टे, हेगेल और शोपेनहावर जैसे बाद के विचारकों पर तथा आधुनिक नैतिक और राजनीतिक दर्शन की चर्चाओं पर गहरा प्रभाव डाल चुकी है। कांट के लिए यह उनकी आलोचनात्मक परियोजना का गहन विस्तार था, जिसने उनकी सैद्धांतिक दर्शन को एक ठोस नैतिक ढांचे से जोड़ा, जो आज तक नैतिक सिद्धांतों के स्वरूप को प्रभावित करता है।